Jul 17, 2013

"अंत तक अकेले है"



अंत तक अकेले है सब यहाँ 
कोई साथ नहीं अंतिम पड़ाव तक 
कोई नहीं पकड़े रहता ऊँगली हमेशा,

इस कठोर कर्मभूमि में किसान हम 
अकेले ही बीज बोना अकेले ही पाना,
कोई नहीं रहता साथ कर्मों के
ज़िम्मेदार हम स्वयं अपने लिए 
अपनी खुशियाँ अपने आँसू के लिए

विचारों और कार्यों के निर्माता हम 
कोई कृष्ण सारथी बन नहीं आने वाला 
अपना रथ खुद अग्रसर करना हमें 
कोई साथ नहीं रहता दिल के 
आत्मा की तो बात ही नहीं

हां,
अंत तक अकेले है सब यहाँ 
कोई साथ नहीं इन साँसों के,
इन जज्बातों के,
इन कर्मों के,
हां
अंत तक अकेले है सब यहाँ .....
  
 मेरी यह कविता मध्य प्रदेश से प्रकाशित होने वाली बेहद खूबसूरत एवं साहित्यिक ई-पत्रिका "गर्भनाल" के जुलाई  २०१३ अंक में मेरी अन्य कवितायों के साथ पढ़ी जा सकती है (पृष्ठ ४६).

*Image Courtesy: Google

9 comments:

  1. That is so true, as they say, we all are alone at the end of day. This thought is weaved beautifully in the poem. Also, the fact that we are the masters of our life. Welcome back to blogosphere, Shaifali :)

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  2. बेहद मार्मिक रचना शैफाली जी
    सुन्दर भाव लिए हुए

    मैंने भी कुछ लिखा था
    आप की कविता से मिलता जुलता
    की हर रिश्ता कष्ट दे
    इससे अच्छा हम साधू हो ले
    कविता की कुछ पंक्तियाँ

    "छण भंगुर संसार है बेटा
    मोह लगा के रिश्ता पाला
    अंतिम में सब दुख ही देता
    नयी जगह पे नए है रिश्ते
    नयी है डोरी नए है बंधन

    जब टूटेगा तार कही से
    या छुटेगी पतवार कही से
    हर कोने से कष्ट कहानी
    छोड़ दे कोना कर मनमानी
    चल मेरे संग साधू हो जा
    छण भंगुर संसार है बेटा"

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  3. very nice poem.....congratulations

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  4. Lovely...so beautifully put the essence of our being...in the end we r all alone in our aspirations, our struggles and our goals...whatever the goals might be...materialistic or otherwise.
    Thanks for sharing ur sincere thoughts on this page...makes me easier to follow u Shaifali.
    Best wishes...on ur journey...the path u have chosen...that u may achieve what u r seeking. :)

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  5. That is the sum total of the journey of life, expressed capably and embedded with sadness.

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  6. यही सच है। हम सब अकेले हैं। अपने कर्मों के फल खुद भोगने हैं। पर हाँ यह सोच अपने अन्दर यदि बिठा लें तो किसी से द्वेष,किसी पट क्रोध.....सब समाप्त हो जाएगा क्यूंकि अंततः जो हमारे साथ होता है,हो रहा है उसमें किसी का दोष नहीं हमारे ही कर्म ज़िम्मेदार हैं
    छपने के लिए बधाई :)

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  7. सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

    शब्दों की मुस्कुराहट पर ..हादसों के शहर में :)

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  8. Its really good... M so true...!!!

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