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Dec 31, 2019

Happy New Year 2020!



आओ लिखे हम-तुम 
कुछ नयी बातें 
आओ रचें हम-तुम 
कुछ नयी यादें। 

बीते सालों पर आओ करे पर्दा 
देखे सूरज जो उग रहा 
गुनगुनी धूप में आओ बैठे हम-तुम 
देखे ख्वाब एक नया सा। 

जो बीत गए है लम्हें 
फिसल गए जो हाथों से पलछिन
आओ भूल चले उन्हें हम-तुम 
बनाये लक्ष्य एक नया सा।  

जीवन चलते समय-सा
कुछ समेटता-सा कुछ पीछे छूटता-सा 
आओ छोड़ चले वो बातें 
बनाये जीवन एक नया सा। 

बहुत हुआ मेरा-तेरा 
जीवन में करे कुछ नेक सा 
आओ कर्मभूमि-से इस जग में 
बनाये मोक्ष कुछ नया सा 
एक नयी उमंग, नए हौसले सा। 

Wishing one and all a very happy and blessed New Year!

Aug 4, 2017

इंतजार


बहुत दिन गुजरे 
मैंने उन गलियों का फेरा नहीं किया 
जिन पर उगे नीम की निम्बोलियाँ 
फोड़ते पिचकाते बिताई हमने
जाने कितनी जेठ की दोपहरें।

लाखों अरबों लम्हे बीत गये
नहीं चखा मोहब्बत का वो जाम,
जानते हो न 
तुम ही थे वो स्वाद 
वो मधुशाला का मधु 
और मेरा प्याला।

बीती सदियाँ, 
गर्मियों में तुम्हारे
पैरों का मखमल 
नहीं टकराया मेरे पैरों से,
बहुत रातें बीत गयी 
मैंने नहीं ओढ़ा तुम्हें
जाने कितनी शीत ऋतुयें आई-गई 
गरमाई जाने कहाँ गुम हुई…. 

बीतती रही घड़ियाँ 
गुजरती हुई निकली सदियाँ 
मैं आज भी वही खड़ी 
लेकर हाथ में खाली प्याला 
शायद कभी वो रस फिर से 
होठों तक आये 
जिसका स्वाद होठों से रूह तक 
छूकर सदियाँ मीठी कर गया। 


Image Courtesy: Google Images, a Painting by Hemant Majumdar. 

Jul 28, 2017

अम्मा का दरवाजा!


वो जो बड़ा-सा दरवाज़ा था
जिसमें दमकते थे लाखों सूरज हर पल में
जिसमें दिखाई देता था चाँद का शीतल अक्स
जिसमें झरने की कल-कल, समुद्र का फेन दोनों ही साथ निभाते थे,
जिसमें हाथों की लकीरों के कोई मायने न थे
बस था हौसला, विश्वास और नित-नयी उम्मीदें।

मालूम पड़ता है
वो स्रोता किसी मायूस हुए दरीचे-सा वीरान पड़ा है
अब कोई वहाँ आता जाता नहीं,
कोई पुकार, कोई हँसी-मुस्कराहट नहीं,
कोई रौशनी नहीं जन्मती हरी दूब-सी कोमलता,
सूखे पत्तों पर भी कोई सरसराहट नहीं,
शांत, वीरान जैसे चाँद हो, एकदम अकेला। ..

हाँ, अम्मा के घर का दरवाज़ा बंद हो रहा
हर दिन, जाती हुई साँसों-प्राणों जैसा
वह घर जहाँ कईओं ने जन्म लिया, रूप-सीरत संजोई
आज अम्मा उसी घर के छोटे, सीलन भरी लकड़ी के नम दरीचे पर
खड़ी ताक रही है शून्य को,
न जाने क्या मांग रही है,
स्वयं के लिए एक नया द्वार या
दरीचे से ही आ जाये एक छटाँक भर रौशनी!


PS: Image Courtesy: Google images

Feb 16, 2017

चाय और तुम


एक के बाद 
एक और, उसके बाद 
कई और 
चाय की प्यालियों की चुस्कियाँ 
अक्सर मुझे नहीं उबारती 
तुम्हारी यादों की तलब से। 
कम्भख्त ये तो 
मीठी अदरक-वाली चाय 
में भी 
नशा भर देती है 
और दिन ढलने पर रह जाते है 
यादों में डूबे शब्द 
और 
कई खाली पड़े 
चाय के प्याले। 


Image Courtesy: Google Images

May 7, 2016

बूढ़ी माँ ....



बूढ़ी माँ अकेली रह गई
परिंदों से उड़ चले बच्चे
तिनका-तिनका बना घोंसला
आज खाली बेजान रह गया,
बूढ़ी माँ बरबस देखती रह गई।

हाथों में लिए उम्र की झुर्रियां
होठों पर बस स्नेहाशीष-शब्द
काया कोमल जर्जर दीन-हीन
बस रह गई उसके साथ आज
बूढ़ी माँ मात्र शरीर रह गई।

यादों में जला कर बीते दिन के दीये
करती प्रकाश अपने जीवन में वो
आज में न जन्म लेती कोई नई याद
छिन-सा जाता हर पल, सुख-सा आज
बूढ़ी माँ नीर बहाती रह गई।

जोड़ कर अपने कपकपाते हाथ
ईश्वर से बस एक ही दुआ माँगती-
बच्चों का उम्र-भर सुख ऐश्वर्य
और अपने लिए एक नया धाम मांगती
बूढ़ी माँ अभी से स्वर्गगामिनी हो गई।

***

The new generation, I am not talking about the generation next to me or even the one after that, I am pointing out to the generation of kids to any parents. Yes, this new generation, parent's progeny are often impatient and always in a hurry.  The older generation, the parents are weak and old. The one who taught us how to walk, we don't have time to take a walk with them. We are busy, earning our money, too occupied in our struggles, in our progeny and network, and myriads of innumerous tasks that are unending. But what is ending every moment is the remains of the youth or energy within our old parents. They keep getting older by seconds. We, the new generation too. 

Give a thought, what do they ask? Riches, wealth, car, furniture! No, they just ask for a moment of togetherness with us, they want to smile and laugh with us and only demand attention and respect. The new generation can't even give them this? Is it the upbringing they received? Start this Mother's day with a solemn pledge and a staunch thought to care for the mothers (and fathers) you have neglected, spoken to in high volume and thought them as inexperienced with modern ways of life. They need you, today more than ever!

"At least they are happy", Bibhu Sharma's story!


Image and Video Source: HelpAge India, #WhySupportElders

Jan 15, 2016

उस दीवार के पीछे...

Image Source

कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए,
करता है शिरकत लाल ही खून उनकी रगों में,
बसते है ख्वाब भी उनकी आँखों में,
होते है उनके भी कुछ दुःख दर्द, आंसूँ और गम,
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.

है वो भी किसी राखी का रेशम,
किसी घर का सुनहरा दीपक
किसी के दिल का आराम होते है वो भी
पर मालूम न चल सका क्यों दी बंदूके उन्हें?
चाहते तो थे वे भी इक मिला जुला संसार
फिर क्यों?
आखिर क्यूँ बदल दिया उनका रास्ता चल पड़ने के पहले ही?
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.

'उन' पीछे वालों को थमा तो दी विनाश-सामग्री 
पर न सोचा क्या उन्होंने न गाया कोई सुखी गान?
क्या नहीं स्वर दिया विश्व एकता के भावों को?
नहीं हुई तमन्ना फूलों और भवरों की उन्हें?
फिर क्यों?
आखिर क्यूँ बदल दिया उनका रास्ता चल पड़ने के पहले ही?
हाँ! कुछ लोग रहते है उस दीवार के पीछे
होते है मेरी ही तरह बने हुए.


Jan 1, 2016

गुजरता वक्त...


वक्त के साये में
सदा ही रहते हम,
लगता हमें कभी है काबू
और कभी बेकाबू
बस इसी जद्दोजहद में
जीते हम लोग। 

किसने क्या पाया
क्या अधूरा सा रह गया
जा रहा साल कराता ये हिसाब,
नहीं कभी कोई रहता हर पल 
होना ही है फ़ना एक दिन सभी को 
इंसान या वक्त। 

विदा हुआ वर्ष जो कल तक था 
हमारा अपना 
आज बाहें फैलाए हम मचलते 
नव वर्ष के लिए,
क्या नहीं तड़पता जूना वर्ष 
छोड़ उसे दिया हमने बस घड़ी की इक सूई पर। 

नहीं नहीं! वक्त नहीं रुकता कहीं पर 
हम भी साथ चले तो पाएंगे स्वप्न,
जो खड़े ताकते रहे
रह जायेंगे हो कर बदलते वर्षों का शिकार 
आओ, करे ये वर्ष अपने नाम
सिर्फ अपने ही नाम!

छोड़ सब व्यर्थ के बोझों को 
ले अपने कंधे पर स्वयं का सार्थक बोझ 
बुने नए स्वप्न,नई अभिलाषाएं
जोड़ कर हाथ ले ईश्वर का साथ 
और मिला कर हाथ करें जी-तोड़ मेहनत 
बस फिर हर वर्ष खुशियों के नाम 
हमारे और हमारे अपनों के नाम!


Wishing all my readers and visitors a very happy 2016. Dream big and work hard.

Image Source: Google Images


Yay! Good start of the New Year...This poem was selected by Blog Adda as one of the best for Tangy Tuesday Picks, edition dated January 05, 2015.!

Dec 12, 2015

"खुदा"


खुदा मस्जिदों में
नहीं मिला करता
ना ही मंदिरों के
कीर्तन में श्याम
सजा मिलता है ।

मौजूद है 'ईश'
मेरे कण-कण में,
रगों में दौड़ते
खून की गर्मी में,
साँस लेते इनमें
मेरे लक्ष्यों में ।

जो खुद को पा जाऊँ
पा सकूँगी गीता के सार को,
जो भेद पाऊँ निशाना
अर्जुन की मानिन्द
बन पाएँगे मोहन
सारथी मेरे।

वर्ना तो
मंदिरों मस्जिदों के
फेरों में,
गोधूलि के जाप में,
अजानों की पुकार में
बस यूँ ही
मिटती जाऊँगी मोक्ष की तलब में।   

*Image Courtesy: Google Images

Dec 3, 2014

प्रेम मोहना



मनभावन लुभावना 
प्रेम मेरा मोहना 

सजा था झिलमिल 
मस्जिद की चादर-सा 
पढ़ा मैंने उसे 
अल्लाह की नमाज़-सा। 

सुकूं आया था बहुत 
चोट के मरहम-सा 
दर्द भी इक उठा था 
सागर के तूफान-सा। 

सजाया था अधरों पर 
उसे कान्हा की बाँसुरी-सा 
बिताया लम्हा दर लम्हा 
मीरा की भक्ति-सा। 

मनभावन लुभावना 
प्रेम मेरा मोहना ...

Image courtesy: Google Images

Nov 26, 2014

Amen....


एक ख्वाब देखा है तुम्हारे लिए
बड़ा नहीं लेकिन महत्वपूर्ण है। 

भरा है यह सपना आँखों में -
निश्चलता हो तुम्हारी आँखों में,
सरलता हो तुम्हारे हृदय में,
सादगी हो तुम्हरी सोच में। 

जरूरी नहीं सागर की तरह वेग हो
मगर हो उसकी गहराई,
जरूरी नहीं हो तुम में संगीत का शोर
मगर हो उसका मंत्रमुग्ध कर देने वाला सुर,
जरूरी नहीं आज का बिंदासपन हो तुम में
मगर जरूर हो आज का विश्वास, आज का हौसला। 

बाहरी चमक दमक से परे,
मन की चांदनी से सजा
हो तुम्हारा जीवन.
व्यक्तित्व में हो तुम्हारे बहुत सादगी
और मन में हो तुम्हारे, बहुत आदर। 

बहुत आगे जाओ,पढ़ो लिखो
कलाकार बनो
और लिखो अपने जीवन का गान स्वयं। 

Lots of love, mamma.
(अपनी प्यारी बिटिया के लिए लिखी एक कविता, मन के ख़्वाबों से सराबोर)

Image: From the personal file. 

Nov 10, 2014

Writer's Block!


यह बड़ी ही बेखुदी
है शब्दों की
जब मन होता है
चले आते है,
सैलाब सा ला-ज़ेहन में 
कागज़ पर घर बना जाते है। 

लेकिन,
मैं तो माध्यम ही हूँ 
इस फेरे में,
पुकारूँ जब तो रूठे हुए 
भी पाती हूँ
तड़पा कर मुझे बेहिसाब 
चैन जाने कहाँ पाते है 
यह शब्द।

सोचती हूँ,
ऐसी भी क्या बेखुदी है 
मेरे ही हो मुझसे जुदा हो जाते 
है यह शब्द।

Image Courtesy: Google images

Sep 18, 2014

यादों के फूल


आकाश से गिरता पानी
कैसे खेत की मेढ़ों
में भर,
देता जीवन आने वाली फसलों को…
यहाँ भी
गिरती बारिश की बूँदें
गीला कर रही मन की जमीं को
और मैं इस आस में
भीगती हर ओर
खिलेंगे जीवन बेली में
तुम्हारी "यादों के फूल" ....

Aug 1, 2014

नफ़े नुकसान के शहर में...


कुछ सीली सी यादें, एक गीला-सा मन लिये बैठी हूँ 
तमन्नाओं ख़्वाबों के नासमझ -रंगीन दिए जलाये बैठी हूँ

रेतों पर निशां को हाथों में समेटे बैठी हूँ 
हाथों की लकीरों में छप जाये वो, बस यही फ़रियाद लिये बैठी हूँ 

शब्दों की स्याही में नाम उसका लिए बैठी हूँ 
प्रेम ग्रन्थ लिख मिल जाये वो, बस यही उम्मीद लिये बैठी हूँ 

जहाँ के चमन में उसकी महक लिए बैठी हूँ 
जीवन के सहरा में वही गुलाब खिल जाये, बस यही दुआ लिये बैठी हूँ 

नफ़े नुकसान के शहर में हारती हर दम सी बैठी हूँ 
किसी दिन आके खरीद ले वो मुझे, बस यही ख्वाब लिये बैठी हूँ … 


Image Courtesy: Google Images

Jul 1, 2014

तुम और शब्द!


आज फिर शब्दों का दामन थामने
को मन मचला है
कहीं तुम्हें ही तो दिल ने नहीं
याद किया है!

साँसों में भरकर
खुशबू स्याही की,
खत तुम्हारे ही नाम शायद
लिखा जा रहा है!

हरी दूब से कोमल
कागज़ पर उकेरा शब्द
कहीं तुम्हारी ही सीरत
तो नहीं सजा रहा है!

दिन बहुत बीते
बीते कई वर्ष
न रुकता है, न थमता है
यह रिश्ता
तुम्हारा और मेरे शब्दों का!


Image Courtesy: Google Images

Jun 28, 2014

विलीन!


एक दिन जब ढूँढ़ना चाहोगे मुझे 
उस दिन जब नहीं मिलूँगी मैं 
अपनी मेज़ पर काम करते,
या रसोई में सब्जी काटते 
या फिर बिस्तर की तह भी ठीक करते ना मिल पाऊँ। 

नहीं मिल पाऊँ जब दीनों-दुनिया की
खातिर मुस्कुराते-बात करते 
या फिर दौड़ते-भागते इस काया को 
चुस्त रखने की आस में,
नहीं मिल पाऊँ जब हमारे घर के 
कोने-कोने में,
मोहल्ले के पार्क में बच्चों को 
खेलती देख भी जब ना मिलूँ। 

हाँ,
उस दिन समझ जाना 
मेरा सर्वस्व अब नहीं रहा तुम्हारे नाम का 
मैं डूब गयी कतरा-कतरा अपने 
उसमें जिसे चाहा मैंने रूह से

हाँ,
उस दिन समझ जाना 
पा लिया मैंने स्वयं को 
मैं विलीन हो गयी अपने शब्दों में!



Image Courtesy: (Google) Underwater painting by Californian artist Erika Craig

May 21, 2014

हूक...


ये कैसी प्यास है 
जितनी बुझती उतनी उठती 
ये कैसे पल है 
जितने आते उतने बीतते 
ये कैसा बंधन है 
ना छूटे में ना बंधे में 
बस...
जीवन और तुम-में 
नदी के पाट-सा रिश्ता 
और मैं खड़ी इस पाट 
एक अनवरत हूक के साथ!

Image Courtesy: Google Images

Apr 15, 2014

मन करता है…


"Togetherness"

साँसों में भरकर 
तुम्हारी खुशबू 
आज जीवन को मीठे शहद-सा 
जीने को मन करता है .... 

उँगलियों में फँसा कर 
तुम्हारी उंगलियाँ 
आज सफर लम्बा 
तय करने को मन करता है .... 

पैरों की आहटों में 
रुनझुन तुम्हारी सुन कर 
आज मोहब्बत की ख़ामोशी में 
मदहोश होने को मन करता है .... 

हर पोर में होते स्पंदन 
तुम्हारे स्पर्श से 
सात जन्मों तक बस तेरा ही 
रह जाने को मन करता है  .... 



(Image clicked at Huntington Beach, California)

Apr 8, 2014

आहिस्ता आहिस्ता ...

Shaifali Gupta Indian Hindi Poems
जिस्मों की सरगोशी में 
पिघले मन बहकाते रहे तन 
आहिस्ता आहिस्ता सरकती रही रात... 

छूअन के स्पंदन में 
साँस लेते रहे मदहोश ज़ज्बात 
आहिस्ता आहिस्ता मुस्काते रहे लब... 

सूरज के नारंगी विस्तार में 
यादें रात-की महकी हरश्रृंगार-सी 
आहिस्ता आहिस्ता गुलदस्ता बने हम... 

गिरफ्तार हाथों की लकीरों में 
सपनों की लड़ियों से लदा संसार 
आहिस्ता आहिस्ता जीवन बने हम...


Image Courtesy: Google Images

Mar 25, 2014

तेरे बाद....


विरह वेदना सी स्याही
उतरी आज इस लेखनी में,
जाने कैसे स्याह फूल खिलेंगे
आज इस जीवन की बेली में.

वीरानों सा यह अकेला मंजर
खाली पड़ी इन हथेलियों में,
जाने कैसी सीरत संवरेगी
तेरा नाम नहीं जिन लकीरों में.

पीड़ा सा मधुर शब्द
सदियों छुपा रहा अंतस में,
जाने कैसे प्रेम की शीतल बयार
खोल चुकी यह स्त्रोत, तूफानों में.

शब्दों सा स्थायी बंधन
जुड़ा रूहों के कोनों-कोनों में,
जाने कैसे सुनसान रहेगी
यह कवितायेँ तेरी जुदाई में.

Image Courtesy: Google Images
This poem was published in Hindi Chetna, January 2013 edition.